दिनकर चला है
(नवगीत )
डॉ सुशील शर्मा
नव राह पर
दिनकर चला है।
सुरभित प्रकृति
मधुऋतु सुमन पथ।
दिव्य दिवाकर
चला रश्मि रथ।
दूब उमगी
उड़ता मन भगे।
पथ में काँटे
उगे थे सगे।
घन तमस में
दिनकर पला है।
चूर लड्डू
तिल महकते हैं।
माघ मन में
गुड़ गमकते हैं।
बीहू पोंगल
मकर संक्रमण।
है निज अक्ष पर
दिवि का भ्रमण।
सत्य संकल्प
लेकर चला है।
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