हाइकु
सुशील शर्मा
ठंड में पेड़
रात भर ठिठुरा
ओढ़ता धूप।
चीखती रात
तनहा तारों संग
छिपी चांदनी।
सभ्य मानव
पर्यावरण रक्षा
आरी कुल्हाड़ी।
शब्द वीरान
खोखले से खामोश
झरते पत्ते।
खूनी मंजर
सहमा सा शहर
सत्ता जहर।
रात में चाँद
छत पर टहले
बिंदी लगाए।
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