Thursday, December 17, 2015
क्या शहरी क्षेत्रों का जल पीने योग्य है?
क्या शहरी क्षेत्रों का जल पीने योग्य है?: राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (एन डब्ल्यू डी ए) द्वारा लगाए गए अनुमान के अनुसार वर्तमान में लगभग ...
Friday, December 11, 2015
Monday, August 31, 2015
मानव जीवन की आचार संहिता
---मानस के तुलसी
आज के
सन्दर्भ में जँहा चारों ओर हाहाकार,
भ्रष्टाचार ,भीषण
अशांति मची है संसार के बड़े बड़े मस्तिष्क संहार के नए साधन ढूँढ रहे हैं
सिर्फ रामचरित मानस ही प्रेम के प्रसार में अग्रणी है।वस्तुतः तुलसी का
मानस जो शिक्षा देता है उसमें उपदेश नहीं जीवन का सत्य होता है ,तुलसी की सारी चिंता चारित्रिक तथा सम्प्रदायक सद्भाव पूर्ण उन्नति के रस्ते पर
ले जाने की थी । स्वार्थ ,ज्ञान ,अह्म ,ईर्षा ,बैर के अंधेरों में डूबती इस सदी के सामने आज
तुलसी चिंतामणि लेकर खड़े हैं। इसके सभी
आदर्शों का अवलंबन आवश्यक है।
तुलसी और 'श्री रामचरित मानस 'एक दूसरे के पर्याय लगते हैं। तुलसी का मानस केवल राम चरित्र का ही वर्णन नहीं
हे अपितु मानव जीवन की आचार संहिता है। इसमें प्रत्येक मानव को व्यवहारिक ज्ञान की
शिक्षा मिलती है। श्री रामचरित मानस सिर्फ एक धर्म ग्रन्थ मात्र नहीं है वरन मानस
धर्मों की संकीर्ण सीमाओं से परे एक धर्म की अनुशंसा करता है। वो धर्म मानव धर्म
है। मानस में कही भी हिन्दू धर्म या हिन्दू शब्द का उल्लेख नहीं है। ये तो
सम्प्रदायक भावनाओं से ऊँचा उठ कर मानव -मानव के बीच में प्रेम सामंजस्य समानता व
एकता को प्रतिष्ठित करता है। सच तो ये है की उन्नत मानवता ही तुलसी के मानस का
केंद्र है।
- किस अवसर पर मानव को कैसा
आचरण करना चाहिए हर स्थान पर मानस में इसका उल्लेख मिलता है। माता -पिता की आज्ञा
का पालन ,गिरे एवं निम्न वर्ग के लोगो के साथ प्रेम भाव दूसरों के
अधिकारों को सम्मान की दृष्टि से देखना ,एक राजा का प्रजा के
प्रति कर्त्तव्य ,एक पत्नी का पति के प्रति कर्त्तव्य ,बुजुर्गों की राय का मह्त्व ,शत्रु के साथ व्यवहारिक नीति। इन सब आचार संहिताओं का कालजयी दस्तावेज श्री रामचरित मानस है।
श्री
रामचरित मानस सर्वांग सुन्दर ,उत्तम काव्य लक्षणों से
युक्त,साहित्य के सभी रसों का आस्वादन करने वाला,आदर्श ग्राहस्थ जीवन आदर्श राजधर्म,आदर्श पारिवारिक जीवन,पातिव्रत्य धर्म,आदर्श भ्रातृ प्रेम के साथ सर्वोच्च भक्ति
ज्ञान,त्याग वैराग्य एवं सदाचार व नैतिक शिक्षा देना वाला सभी
वर्गों ,सभी धर्मो के लिए आदर्श ग्रन्थ है।साक्षात शिव ने जिस
ग्रन्थ पर अपने हस्ताक्षर सत्यं शिवं सुन्दरं लिख कर किये हों उस ग्रन्थ का वर्णन
संभव नहीं है
अंत में तुलसीजी के बारे में
संक्षिप्त ------
1 - संवत 1554
में श्रवण शुक्ल सप्तमी के दिन बारह माह गर्भ में रहने के पश्चात तुलसीदासजी का
जन्म हुआ।
2 - 1583 जेष्ठ शुक्ल 13 गुरुवार को विवाह हुआ।
3 - 1607 को मोनी
अमावस्या के दिन चित्रकूट में हनुमानजी की कृपा से श्री रामचन्द्रजी के दर्शन हुए।
4 - 1631 में रामचरित मानस की रचना प्राम्भ की
एवं 1633 में पूर्ण हुई।
5 - 1680
में श्रवण कृष्ण तृतीया को शनिवार के दिन वे श्री राम में विलीन हो गए।
आरक्षण ----वंदन
या क्रंदन
भारत में आरक्षण की शुरुआत प्रमुख कारण वंचित समाज को
प्रतिनिधित्व देना था। प्राचीन काल से
दलित एवं शोषित वर्ग को राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ने के प्रयास से आरक्षण की शुरुआत हुई ,लेकिन आज ये बहुत
बड़े विवाद का विषय बन कर हमारे समाज को
बाँट रहा है। जिन्हे आज आरक्षण मिल रहा है
उन्हें ही आरक्षण के सही अर्थ नहीं मालूम,लोग सिर्फ सरकारी
संस्थानों एवं सरकारी नौकरियों में स्थान पाने को ही आरक्षण समझते हैं।
आरक्षण प्रतिनिधित्व के लिए हैं न कि नौकरी पाने के लिए, गरीबी दूर करने
की योजना के अंतर्गत जो लाभ वंचित समूहों को दिए जाते है। लोग उन्हें आरक्षण मान
कर अधिकार समझते है। आरक्षण किसी चिन्हित वंचित वर्ग को मुख्य धारा में लाने
का साधन है,ताकि तंत्र में पर्याप्त प्रतिनिधित्व के सहारे
वह राष्ट्र के निर्माण में सहयोग प्रदान कर सके,ना कि नौकरी व
रोजगार देकर कुछ व्यक्तियों का भला किया जा
सके।
संविधान के निर्माताओं का मानना था की जाति व्यवस्था के
कारण अनुसूचित जाति एवं अनसूचित जन जाति ऐतिहासिक रूप से दलित रहे
हैं उन्हें भारतीय समाज में समान अवसर नहीं दिया गया इसलिए राष्ट्र निर्माण में
उनकी भागीदारी कम हैं। अतः भारतीय संसद में अनुसूचित जाति एवं अनसूचित जन जाति के प्रतिनिधित्व के लिए
आरक्षण नीति का विस्तार किया गया। कम
प्रतिनिधित्व वाले समूहों की पहचान के लिए जाति ही सबसे कारगर मापदंड माना गया तभी से जाति गत आरक्षण की शुरुआत हुए हालाँकि कम प्रतिनिधित्व वाले समूहों की पहचान के लिएअन्य
मापदंड भी रखे गए जैसे लिंग ,अधिवास के राज्य ,ग्रामीण जनता
आदि। भारत में प्राचीन कल से ही दलित की पहचान का मुख्य आधार अस्यपृश्यता है।
किन्तु इस अस्यपृश्यता की अवधारणा का अभ्यास पूरे देश में एक सा नहीं था। भारत के
दक्षिणी भाग में अस्यपृश्यता की अवधारणा अधिक प्रचिलित थी इस कारण दलित वर्गों की
पहचान कोई आसान काम नहीं था।
इसलिए
समस्त प्रकार का प्रतिनिधित्व दिलाने के
लिए अनुसूचित जाति को 15 % व अनसूचित जन
जाति को 7. 5 % के आरक्षण का प्रावधान रखा गया जिसकी अवधि 5 वर्ष रखी गयी
एवं समीक्षा के उपरांत उसे बढ़ाने का प्रावधान भी रखा गया।
जातियों की
सूचीकरण के कार्य का लम्बा इतिहास है
ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान सन 1806 से शुरू किया
गया था इसमें देश की सामाजिक एवं आर्थिक रूप से विपन्न जातियों को शामिल किया जाने
लगा था।
1882 में हंटर आयोग की नियुक्ति हुई जिसमे महात्मा ज्योतिराव फुले
ने निशुल्क अनिवार्य शिक्षा के साथ सरकारी नौकरियों में दलितों के लिए आनुपातिक
प्रतिनिधित्व की मांग की थी।
1942 में बी.आर. अम्बेडकर ने अनुसूचित जातियों के उन्नयन के
लिए अखिल भारतीय दलित वर्ग महा संघ की स्थापना कर दलितों के लिए आरक्षण के रूप
में प्रतिनिधित्व की मांग की थी।
1947 से 1950 तक संविधान सभा में बहस हुई एवं 10 साल तक
राजनैतिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए
अनुसूचित जाति एवं अनसूचित जन जाति
के लिए अलग से निर्वाचन क्षेत्र आवंटित किये गए एवं हर दस साल बाद संविधान में
संशोधन कर इन्हे बढ़ा दिया गया।
1990 में
तत्कालीन विश्वनाथ प्रताप सरकार ने मंडल कमीशन की सिफारशें लागू कर आरक्षण विरोधी आंदोलन के शोलों को भड़का
दिया।
1991 में नरसिम्हा
राव सरकार ने अगड़ी जाती के कमजोर लोगों को 10 % आरक्षण शुरू किया।
2008 में सर्वोच्च न्यायालय ने "क्रीमी लेयर "को
आरक्षणनीति के दायरे से बहार रखने का फैसला लिया।
साथ ही
सर्वोच्च न्यायालय ने सभी प्रकार के आरक्षण को 50 % तक सीमित कर दिया क्योंकि
सर्वोच्च न्यायालय का मानना था की इस से
अधिक आरक्षण में समान अधिगम सुरक्षा का
उल्लंघन होता है।
दरअसल संविधान की नीति एवं आरक्षण का प्रावधान तो सही था
लेकिन समय के साथ ये नीति राजनीति बन गई। आरक्षण का उपयोग राजनैतिक मकसदों के लिए
किया जाने लगा। आरक्षण पर वोट बैंक की राजनीति हावी हो गयी ,समाज को बाँट कर
राजनैतिक लाभ लेने का माध्यम आरक्षण बन चुका है। आरक्षण की सुविधा को लोग अधिकार
मान बैठे हैं। एवं दलित गावों में बैठा अभी भी प्रतिनिधित्व को तरस रहा है।दूसरी
और मलाईदार फायदा उठा कर अपनी पीढ़ियाँ सँवार रहे हैं।
आरक्षण के समर्थन में तर्क ------ आरक्षण समर्थकों का तर्क है की पिछले हज़ारों
सालों की असमानता सिर्फ कुछ वर्षों की आरक्षण नीति से नहीं बदलने वाली है। आरक्षण
कम प्रतिनिधित्व वाली जाति समूहों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने का एकमात्र साधन है। आरक्षण वास्तव में वंचित समूहों एवं
हाँसिए पर पड़े लोंगो के सफल जीवन जीने में
मददगार है। प्रतिनिधित्व या आरक्षण से ग्रामीण क्षेत्रों के दलित समाज देश की मुख्य
धारा में जुड़ सकेंगे एवं आरक्षण के द्वारा प्रतिष्ठित हो कर समाज में ऊँचा स्थान मिलेगा जो उन्हें पिछले हज़ारों वर्षों से
नहीं मिला। आरक्षण से जातिगत भेदभाव ख़त्म हो सकेगा।
आरक्षण के विरोध में तर्क ------आरक्षण विरोधियों के अनुसार आरक्षण संकीर्ण
राजनैतिक उद्देश्य की प्राप्ति का साधन है। आरक्षण प्रतिभाशालियों का दमन करता है
व उद्देश्य की गुणवत्ता को कम करता है।
अगड़ी जाति के गरीब पिछड़ी जाति के अमीरों से सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पीछे हैं।
वास्तव में परंपरागत रूप से ब्राह्मण सबसे गरीब व पिछड़ी जाति है। हज़ारों वर्षो से
भिक्षा यापन करके अपनी जिंदगी जीते है।
आरक्षण की नीति से प्रतिभा पलायन में वृद्धि हुई है। प्रायवेट संस्थानों में आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है ,इस कारण सरकारी
संस्थान गुणवत्ता में पीछे रह जाते हैं।
भारतीय समाज में
ऊँच नीच के मायने जाति आधारित हैं लेकिन
अन्य कारकों को भी नजर अंदाज़ नहीं किया जा सकता है। आरक्षण का निर्णय उद्देश्य के
आधार पर होना चाहिए। जिस दलित समूह या वंचित समूह को प्रतिनिधित्व देना है अंतिम सदस्य तक इस सुविधा का लाभ पहुंचना चाहिए,जो नहीं पहुंच
रहा है। एक उच्च अधिकारी ,विधायक, मंत्री जो वंचित जाति से हैं क्या उनकी पीढ़ियों को आरक्षण
का लाभ मिलना चाहिए ? या जो वह लाभ गावों में बैठे सबसे दलित गरीब जो
उसी वंचित समूह से है उसे मिलना चाहिए ये एक यक्ष प्रश्न है।
सरकार को प्राथमिक शिक्षा पर यथोचित
महत्व देना चाहिए एवं आरक्षण को समाप्त करने के लिए कोई दीर्घकालिक योज़ना
सभी पक्षों की सहमति से तैयार करना चाहिए।
जिन वर्गों को आरक्षण से बाहर रखा हैं उन वर्गों की भावनाओं को
ध्यान में रख कर उनके गरीब एवं प्रतिभा
शाली समूहों के लिए कोई कारगर नीति बनाना
चाहिए ताकि उन्हें ये न लगे की उनके अधिकारों को छीन कर किसी और को दिया जा रहा
है। वरना हरियाणा में जाटों ,राजस्थान में गुर्जरों एवं गुजरात में
पाटीदारों के आंदोलनों की तर्ज पर देश के कई भागों में ये आक्रोश सरकार एवं देश के
लिए नुकसान दायक हो सकता है।
जाति व्यवस्था के
उन्मूलन के लिए एवं सामाजिक असमानता को मिटाने के लिए समग्र राष्ट्रीय चेतना को
सामने रख कर सद्भाव पूर्ण माहोल तैयार करना चाहिए।
दलित एवं
शोषित हर वर्ग हर जाति में हैं अगर हम राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ती एवं व्यक्तिगत
हितों को त्याग कर सभी जातियों के गरीब
एवं शोषितों के उत्थान के लिए उनको
राष्ट्र की मुख्य धारा में जोड़ने के लिए संकल्पित हो जावें तो शायद ये सामाजिक टकराव ,वैमनश्यता दूर कर एक समता मूलक समाज की स्थापना कर सकते
हैं।
राष्ट्रीय अस्मिता का
त्यौहार ---रक्षाबंधन
भारतीय परम्परा एवं जीवन शैली में विश्वास ही
मूल बंधन है। सर्वेः भवन्तुः सुखिनः का उद्घोष करने वाली त्योहारों की परम्परा
राष्ट्र को गौरवान्वित करती है। रक्षाबंधन के त्यौहार में राष्ट्र की सामाजिक
समरसता,सांस्कृतिक अभिव्यक्ति ,एवं अतीत से जुड़े रहने का
सुखद अहसास है।
राष्ट्र की गंगा जमुनी तहजीब के सच्चे
स्मारक हमारे त्यौहार ही हैं। रक्षाबंधन का त्यौहार इसी परम्परा का निर्वहन करता
है। रक्षा सूत्र का कलाई पर बंधना सिर्फ रक्षा का वचन ही नहीं अपितु प्रेम,सम्पूर्ण निष्ठा व संकल्प के द्वारा हृदय को बंधने का एक अद्भुत प्रयास है।
गीता में कृष्ण ने कहा है 'मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणि गणा इव ''अर्थात सूत्र अविच्छिनता का
प्रतीक है।
यह त्यौहार भारतीय
परम्पराओं ,ऐतिहासिक प्रतिपादनों, सामाजिक समरसता ,पौराणिक आख्यानों एवं भारत के एकनिष्ठ राष्ट्र
की परिकल्पनाओं को प्रतिपादित करता है।
पौराणिक संस्मरणों में राजा बलि
के द्वारा 100 यज्ञ पूरे करने के पश्चात स्वर्ग को हथियाने की लालसा को जब विष्णु
रूप वामन भगवान ने विफल कर दिया एवं तीन पग में पूरे ब्रह्माण्ड को नाप कर राजा बलि
को रसातल भेज कर स्वयं हमेशा उनके साथ रहने के लिए चले गए तब लक्ष्मीजी ने राजा
बलि को भाई बना कर रक्षा सूत्र बांधा एवं उपहार स्वरुप अपने पति को वापिस पाया। तब
से हर ब्राह्मण यह श्लोक कह कर यजमान को संकल्पित करता है।
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल.
इसका अर्थ यह है
कि रक्षा सूत्र बांधते समय ब्राह्मण या पुरोहत अपने यजमान को कहता है कि जिस
रक्षासूत्र से दानवों के महापराक्रमी राजा बलि धर्म के बंधन में बांधे गए थे
अर्थात् धर्म में प्रयुक्त किए गये थे, उसी सूत्र से मैं तुम्हें
बांधता हूं, यानी धर्म के लिए प्रतिबद्ध करता हूं। इसके बाद
पुरोहित रक्षा सूत्र से कहता है कि हे रक्षे तुम स्थिर रहना, स्थिर रहना।
जब द्रौपदी ने कृष्णा की कलाई में से रक्त बहते देख अपनी
साडी का किनारा फाड़ कर बांधा तब कृष्णा और द्रौपदी का भाई बहिन का उत्कृष्ट सम्बन्ध बना।
ऐतिहासिक रूप से राजा
पुरू एवं सिकंदर महान की पत्नी का भाई बहिन का पावन रिश्ता जिसके कारन पुरू ने
सिकंदर को कई बार जीवन दान दिया।
कर्णावती का अपने भाई हुमांयू को रक्षा सूत्र
भेज कर अपनी अस्मिता का वचन लेना यद्यपि हुमांयू के समय पर न पहुँचने के कारण
कर्णावती को जौहर करना पड़ा था जिसका पश्चाताप हुमांयू को हमेशा रहा था।
ये सभी
रिश्ते मानव सम्बन्धों की बुनियाद हैं जिन से सबक लेकर हम अपने संस्कारों को
परिमार्जित कर सकते हैं।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जन जागरण में रक्षाबंधन के पर्व का सहारा लिया
गया। 1905 में लार्ड कर्जन ने बंग भंग करके वन्देमातरम आंदोलन को शोलों में बदल
दिया ,लार्ड कर्जन का विरोध करते हुए रविन्द्र नाथ टैगोर लोगों के
साथ यह कहते सडकों पर उतरे थे।
सप्त कोटि लोकेर करुण क्रन्दन, सुनेना सुनिल कर्ज़न दुर्जन;
ताइ निते प्रतिशोध मनेर मतन
करिल, आमि स्वजने राखी बन्धन।
उत्तर भारत से
लेकर दक्षिण भारत में यह पर्व अलग नाम एवं अलग अलग पद्धतियों से मनाया जाता है।
उत्तर भारत में "श्रावणी "नाम से प्रसिद्ध यह पर्व ब्राह्मणों का
सर्वोपरि त्यौहार है। यज़मानो को यज्ञोपवीत एवं रक्षा सूत्र देकर दक्षिणा प्राप्त
की जाती है। महाराष्ट्र में इस अवसर पर समुद्र के स्वामी वरुण देवता को प्रसन्न
करने के लिये नारियल अर्पित करने की परम्परा भी है। दक्षिण भारतीय ब्राह्मण इस
पर्व को अवनि अवित्तम कहते हैं। यज्ञोपवीतधारी ब्राह्मण स्नान करने के बाद ऋषियों
का तर्पण कर नया यज्ञोपवीत धारण करते हैं।
महाकौशल क्षेत्र विशेष कर नरसिंहपुर एवं गाडरवारा परिक्षेत्र बुंदेलखंड एवं
गोंडवाना संस्कृतियों का अद्भुत संगम क्षेत्र
है। यंहा की सभ्यता एवं बोली पर इन दोनों
संस्कृतियों का प्रभाव है। रक्षाबंधन पर्व
कजलियों के बिना अधूरा है। श्रावण शुक्ल नवमी के दिन लोग बांस की टोकरियों या
पत्तों के बड़े दोनों में गेंहू बोते हैं। भाद्रपद कृष्ण प्रथम के दिन इन अंकुरित
कजलियों को जिन्हे आंचलिक भाषा में "भुजरियाँ " कहते हैं अपने इष्ट देव
को समर्पित करके नदी में विसर्जित करते हैं एवं विसर्जन के पश्चात थोड़ी
कजलियाँ घर लेकर आते हैं। शाम को सब समूह बना कर अपने इष्ट मित्रों
के घर घर जा कर भुजंलियों का आदान प्रदान करके बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं जिस घर
में उस वर्ष कोई मृत्यु हुए हो उस घर में जाकर लोग कजलियों के आदान प्रदान द्वारा
सांत्वना देते हैं। उस दुखी परिवार को गहन दुःख से निकालने की एक अद्भुत परम्परा
एवं सामाजिक सौहाद्र से जुडी ये प्रथा निश्चित ही अनुकरणीय है ।
रक्षा बंधन के पर्व को किसी जाति, धर्म या ,परम्परा से जोड़ना उसके निहित अर्थों को लघुता
प्रदान करना है। ये पर्व मानव से
मानव एवं मानव से प्रकृति के संबंधों को उच्चता प्रदान करने वाला है।
राष्ट्रीय अस्मिता को पहचान देने वाला एवं भाषाई एवं क्षेत्रीय सीमाओं को
लाँघ कर परस्पर
स्नेह के बंधनो को बाँधने वाला त्यौहार
है। कलाई पर बंधा हुआ सूत्र एक बहिन के विश्वास एवं भाई के संकल्प का प्रतिरूप है।
हमारी राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय अस्मिता को एक सूत्र में पिरोने का अवसर यह त्यौहार
है। इस पर्व में समता ममता व समरसता रची बसी है जो की हमारे जीवन का मूल
आधार है, एवं हमारे राष्ट्र के अविच्छिन्न होने के संकल्प को प्रति
पादित करता है।
नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमेत्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम्।
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थेपतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते।
एक सिसकती नदी की आत्मकथा ⚡
========================
मुझे नहीं मालूम मेरा नामकरण किसने किया किन्तु मेरे गुणों के आधार पर ही यह नामकरण किया गया है ये निश्चित है। मेरा स्वच्छ निर्मल जल पीने में ""शक्कर """से काम शीतलता नहीं देता। इस पूरे क्षेत्र की प्रमुख उपज गन्ना है। इस फसल का मुझ से कोई न कोई नाता अवश्य है।
सतपुड़ा के घने एवं गहरे जंगलो के बीच छिंदवाड़ा जिले के सीता पहाड़ से मेरा जन्म हुआ। किवदंती है की वाराह भगवन ने हिरण्याक्ष दैत्य के बध के पश्चात पश्चाताप के लिए अपने अग्र दांतों को पृथ्वी में गाड़ कर मुझे उत्पन्न किया एवं मुझ में स्नान के पश्चात दोषमुक्त हुए तब से लोग मुझे वाराही गंगा के रूप में भी जानते हैं।
मेरा प्रवाह भी मेरी माँ नर्मदा की तरह पूर्व से पश्चिम की ओर है । उछलती कूदती जंगलों को पार करती हुए एक छोटी बच्ची सी चंचल अपने प्यारे पिता सतपुड़ा के कन्धों पर फुदकती हुए आगे दौड़ती गई। यही बीच में मेरी सहेली हरदू गले मिल गई। हम लोग दोनों सहेलिया अठखेलियां करती हुए आगे बढ़ी फिर प्यारे पिता से विदा ले कर मैं समतल पर आई तो मेरा प्रवाह सम हो गया,एक नवयौवना की तरह इठलाती हुई में अपने गंतव्य की ओर बढ़ चली मेरे किनारे पर बसे गांवों खढ़ई धमेटा शाहपुर कल्याणपुर ,रायपुर आदि को अपने स्नेह से सींचती हुई गाडरवारा के नजदीक केंकरा गाँव पहुंची। यंहा पर मेरी प्यारी बहिन सीतारेवा ने मुझे आकंठ कर लिया।,अपनी प्यारी बहिन से मिल कर में गदगद हो गई।
इस के बाद मेरा सबसे सुन्दर घाट "रामघाट "है। यंहा मेरी आत्मा बसती हैं आज भी में अपनी सम्पूर्ण नीली आभा के साथ यंहा पर रहती हूँ। यंहा पर आचार्य रजनीश का बचपन खेला है। तुम्हारे लिए ओशो भगवान होंगे मेरेलिए तो वो मेरा प्यारा पुत्र था जो मेरी गोद में घंटों खेलता रहता था। वस्तुतः रजनीश का ओशो या भगवान या आचार्य बनने का प्रथम चरण मेरी गोद से ही प्रारम्भ हुआ था। वह सत्य का सत्यार्थी हमेशा तथ्य एवं अनुभव की बात करता था। सत्य विश्वास नहीं अनुभव है ,विश्वास झूठा ,एवं अँधा हो सकता है लेकिन अनुभव सच्चाई की कसौटी पर कसा हुआ खरा सोना है जो कभी गलत नहीं हो सकता।
छिड़ाव घांट मेरा सामाजिक एवं सांस्कृतिक उत्सव का केंद्र हैं। इस शहर की सांप्रदायिक सौहाद्रता प्रतीक है। इस शहर के समस्त नागरिकों से मेरे मिलने का स्थल है। गणेश प्रतिमायों से लेकर दुर्गा प्रतिमाओं एवं जवारे एवं तीजा से लेकर ताज़ियों का विसर्जन इसी घांट पर किया जाता हैं।
गाडरवारा शहर के इतिहास की मैं सम्पूर्ण साक्षी हूँ। एक छोटा सा गाँव गड़रियाखेड़ा किस तरह से गाडरवारा शहर में परिवर्तित हो गया ये शायद मेरे आशीर्वाद का ही प्रतिफल है। गाडरवारा शहर के विकास के सारे सूत्र मेरे पास हैं। मुझे अपने प्राणो से ज्यादा प्यारे इस शहर पर नाज हैं। भले ही इस शहर ने मेरी कभी परवाह नहीं की हो। आज मेरा अस्तित्व खतरे में है। अपने प्रिय शहर के पास मैं अपनी अस्तित्व की लड़ाई अकेले लड़ रही हूँ। मेरी एक एक साँस को मुझ से छीना जा रहा है खनन माफियाओं द्वारा बड़े पैमाने पर मेरे शरीर को क्षत विक्षत किया जा रहा है। लेकिन ये शहर मौन है। बहुत अधिक रेत की खुदाई होने से मेरे अंदर पानी के भण्डारण की क्षमता धीरे धीरे खत्म होती जा रही है। 25 साल पहले जंहा मैं पानी से लबालब भरी रहती थी आज मुश्किल से दो चार महीने ही मुझ में प्रवाह रहता है। आज सुख कर मैं काँटा हो गई हूँ। भूगर्भ वैज्ञानिकों के अनुसार इसी क्रम से मेरा दोहन होता रहा तो मेरी मौत सुनिश्चित है।
एक समय था जब वेदकाल के ऋषि एवं मुनियों द्वारा पर्यावरण के भू संतुलन के सूत्रों को ध्यान में रखते हुए नदियों को पर्यावरण संतुलन का मुख्य आधार माना था। उन्हें देवी का दर्जा देकर पूजा जाता था यथा संभव शुद्ध रखा जाता था। समाज में नदियों के प्रति सदैव सम्मान का भाव रहा है लेकिन औद्योगकीकरण से प्रकृति के इस तरल स्नेह को संसाधन के रूप में देखा जाने लगा और यही से श्रद्धा भावना का लोप हो गया एवं उपभोग की लालसा बढ़ गई।
प्राकृतिक संसाधनो के दोहन का सबसे ज्यादा खामियाजा नदियों को ही भुगतना पड़ रहा है। और सर्वाधिक पूज्य नदियाँ खनन माफियाओं के लोभ का शिकार बन कर सिसक रही हैं।
इस क्षेत्र में मेरे अलावा मेरी बहन दूधी एवं मेरी माँ नर्मदा सबसे ज्यादा खनन माफियाओं का शिकार हुईं हैं। प्रत्येक घाट प्रत्येक गाँव में मेरे किनारों से मुझे नोचा जा रहा है पानी के बाद जो ऊपरी सतह होती है वही मेरा जीवन आधार है। उसी के सहारे मैं अपनी ऑक्सीजन यानि पानी का पर्याप्त भंडारण करती हूँ जिससे मेरी ऊपरी सतह पर साल भर पानी बना रहता हैं लेकिन उस के रेत में निकल जाने के बाद मेरा सारा पानी नीचे जमीन में चला जाता हैं एवं मैं सुख जाती हूँ। मेरा यही स्वर्ण भंडार मेरे पुत्र खोद कर मुझे मरने पर मजबूर कर रहे हैं। मेरा प्रवाह मर रहा है। मैं करवट बदल बदल कर सिसकियाँ ले रही हूँ लेकिन इस शहर को मेरी आहें मेरी टूटती सांसे सुनाई नही दे रही हैं।
शहर के विस्तारीकरण का कहर मुझ पर टूट रहा है। हर जगह मेरे किनारों के करीब कालोनियों का निर्माण हो रहा है मुझ में सैंकड़ो टन कचरा फेंका जा रहा है। शहर के सब गंदे नाले मुझ में आकर मिल रहें हैं। मंदिरों के फूल पूरे शहर के घरों में होने वाली पूजाओं के फूल एवं पूजन सामग्री का कचरा मुझ में डाला जा रहा है।
ऐसा नहीं है की इस शहर में सभी ने मुझ से मुँह मोड़ लिया हो ,कुछ मेरे साहसी पुत्रों ने बोरी बंधान बांध कर मुझे ऑक्सीजन देने की कोशिश की थी लेकिन ये प्रयास ऊंट के मुँह में जीरा साबित हुआ।
आज गाडरवारा विकास के पथ पर तेजी से अग्रसर है कुछ सैकड़ों की आबादी लाखों पर पहुचने वाली है। एन टी पी सी। कोल माइंस,सोया फैक्टरी ,पावर प्लांट एवं अनगिनित कम्पनियाँ विकास के सपने दिखाने आ रही हैं। मुझे भी विकास अच्छा लग रह है मेरे शहर के नौजवानों को रोजगार मिलेगा लेकिन क्या सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक चिन्हों को मिटा कर विकास की परिभाषा लिखी जानी चाहिए ?क्या मुझे बचाने के लिए कोई सरकार कोई जन प्रतिनिधि… कोई संग़ठन ,कोई नागरिक आगे नहीं आयेगा ?अगर उत्तर "नहीं "है तो इस शहर का दुर्भाग्य होगा ! अगर उत्तर "हाँ "तो विकास मैं मेरी भी सहभागिता होगी, मेरे संस्कार होंगे, मेरा तन मन धन होगा।
आगे पुराणो में वर्णित शुक्लपुर (सोकलपुर )में मेरी माँ मेरा इंतजार कर रही है। मैं कितने ही कष्ट में रहूँ ,जब भी मेरी माँ नर्मदा का स्मरण होता है मैं प्रफ्फुलित होकर उनसे मिलने को उतावली होकर चलने लगती हूँ। जब मेरा प्रवाह यौवन पर होता है तो माँ नर्मदा उसे दिशा देती हैं और जब में कष्ट में होती हूँ सूखे प्रवाह के समय माँ मुझे बल देतीं हैं और आत्मीयता से गले लगा लेती हैं। क्योंकि वो जानती हैं।
दुख नहीं रहते सदा ,सुख भी सूख जाते हैं।
प्रेम के तरल प्रवाह में सागर भी डूब जाते हैं
📝 सुशील कुमार शर्मा
( वरिष्ठ अध्यापक)
शासकीय आदर्श उच्च .माध्य. विद्यालय गाडरवारा
Friday, August 14, 2015
समान शिक्षा नीति
सबको शिक्षा सबको काम.… सुन ने मे बहुत सुन्दर लगता है यह नारा … आज भी समान शिक्षा नीति की बाट जोह रहा भारत आज चिंतित है .... संवेदना विहीन … नैतिकता से जरा सी दूर। .... व्यवसाय से जरा सी पास …आज की शिक्षा व्यवस्था दो राहे पर खड़ी है .... दो रास्तों के बीच अंनत फासला है.… एक रास्ता जाता है …टाउन स्कूल कर उन सभी गॉवों की ओर जंहा सरकारी टाट पट्टी वाले स्कूल हैं.... एक अनुत्तरित सा न जाने किस और … दूसरा रास्ता जाता है .... अनगिनित कान्वेंट स्कूलों से .... जो अंग्रेजी को सिखाते हुए या हिंदी को भुलाते हुए..... अनगिनित नौकरियों की जिज्ञासा जगाते हुए … अभिजात्य वर्ग के बच्चों को और आगे ले जाते हुए .... या सरकारी स्कूल के बच्चों को पीछे धकेलते हुए … एक निश्चिंतता की तरफ़… आनुपातिक आंकड़े डरावने हैं .... आज नब्बे के दशक के बाद आज सरकारी स्कूलों के कितने बच्चे आशुतोष राणा शशि कांत शर्मा बन कर वैश्विक परिदृश्य में हैं … कितने बच्चे वरदमूर्ति मिश्रा ,इक़बाल मोहम्मद आशीष श्रीवास्तव या इनके जैसे अन्य और बन कर देश सेवा कर रहे हैं.... कितने बच्चे आज राजेश गुप्ता पंडित प्रेमनारायण त्रिपाठी बन कर शिक्षकों के प्रेरणा स्त्रोत बने हैं कितने बच्चे कुशलेंद्र श्रीवास्तव अनिल गुप्ता कपिल साहू बन कर निर्भीक पत्रकारिता कर रहे हैं … सभी मेरे अजीज हैं इस लिए इनका उदाहरण दे रहा हूँ ऎसे और भी हैं लेकिन .... इनकी गिनती उँगलियों पर ही है और ये सभी जबकि हैं जब कान्वेंट स्कूलों का उदय ही हुआ था .... अलग अलग आर्थिक स्तर के विद्यालओं से अलग अलग सोच लेकर जाने वाले ये भविष्य के नागरिक क्या देश के लिए समन्वय की सोच रखेंगे …
गाडरवाड़ा का श्री सार्वजानिक पुस्तकालय: जहां विदेशी भी सर झुकाते हैं
मध्यप्रदेश
मध्यप्रदेश का गाडरवारा शहर या यूँ कहें कि क़स्बा की पहचान के दो बहुत महत्वपूर्ण चिन्ह हैं पहला आचार्य रजनीश या ओशो जिनका बचपन इस शहर में बीता दूसरा चिन्ह हैं यंहा की तुवर (राहर) की दाल जो की भारत में ही नहीं विश्व में विख्यात है। लेकिन इन दोनों से इतर इस शहर का एक और सांस्कृतिक विरासत का चिन्ह है यंहा का सार्वजानिक पुस्तकालय "श्री सार्वजनिक पुस्तकालय "के नाम से प्रसिद्द इस पुस्तकालय का इतिहास करीब 100 वर्ष पुराना है।
1910 में लोकमान्य बालगंगाधर तिलक के आवाहन "घर घर गणेश शहर शहर पुस्तकालय से प्रेरित होकर गाडरवारा के एक नवजवान स्व. श्री लक्ष्मीनारायण खजांची ने अपने 6 साथियों के साथ 1914 में 25 किताबें एक बक्से में रख कर इस पुस्तकालय की नीव रखी थी 1936 में सरकारी जमीन पर भवन की नींव डाली गई 1956 में रजिस्ट्रेशन होने तक यह पुस्तकालय अपने पूरे योवन पर पहुँच गया था। आज इस पुस्तकालय में करीब 20 हजार पुस्तकें संगृहीत हैं।
60 से 90 के दशक के समय लोगों में पढ़ने का जूनून था ,स्व अध्ययन से लगाव था वह पीढ़ी जानती थी की पुस्तकालय ज्ञान का वो अद्भुत मंदिर हैं जँहा हम बुद्धि का विकास करते हैं ,गुरु सिर्फ पथ प्रदर्शन करता हैं किन्तु ज्ञान का विकास सिर्फ पुस्तकालय से ही संभव है। अगर रजनीश को ओशो बनाने में इस पुस्तकालय का बहुत बड़ा योगदान हैं तो शायद आप इसे अतिश्योक्ति कहेंगे लेकिन सच यही है। रजनीश प्रतिदिन इस पुस्तकालय से तीन पुस्तके जारी करवा कर ले जाते थे एवं रात भर में तीनो पुस्तकों को पढ़ कर दूसरे दिन वापिस कर जाते थे। आज भी उनकी हस्ताक्षरित पुस्तकें पुस्तकालय में संरक्षित हैं जिन्हे विदेशी बड़ी श्रद्धा से सर माथे लगाते हैं।
समय के साथ पीढ़ियों में बदलाव आया कम्प्यूटर एवं इंटरनेट क्रांति के इस युग में पुस्तकालय संघर्ष करते हुए नजर आने लगे आज की युवा पीढ़ी पुस्तकालय से हट कर इ-लाइब्रेरी का रुख करने लगी ,इ-बुक्स के इस ज़माने में पाठकों की संख्या कम होने लगी लेकिन श्री सार्वजनिक पुस्तकालय ने अपनी पहचान नहीं खोयी आज इस पुस्तकालय में करीब 20000 पुस्तकें जिनमे धर्म, दर्शन, उपन्यास, कहानी, साहित्य, उर्दू, अंग्रेजी, विज्ञानं तकनीकी, सामान्य ज्ञान, पत्रिकाएँ, समाचार पत्र, प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उपयोगी सभी प्रकार से सुसज्जित ये पुस्तकालय शान के साथ गाडरवारा की धरोहर के रूप में विद्यमान हैं।
उस साठोत्तर पीढ़ी के लोग पुस्तकालय के लिए कितने समर्पित थे इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक कॉलेज के सेवानिवृत प्राचार्य स्व. श्री कुञ्ज बिहारी पाठक ने इस पुस्तकालय में निःशुल्क दो वर्ष तक ग्रंथपाल का कार्य किया था। ये ज्ञान के प्रति लगाव एवं पढ़ने की ललक आज की पीढ़ी में दुर्लभ है।
हम सभी की बाल्य स्मृतियों में ये पुस्तकालय हमेशा मुस्कुराता रहेगा पुस्तकों के अभाव में इस पुस्तकालय ने हम सभी को जो ज्ञान दिया वो अविस्मरणीय है। शाम 6 बजे से रात 8 बजे तक यह पुस्तकालय बुद्धिजीवियों का मिलन स्थल होता था। पठन पाठन के अलावा राजनितिक धार्मिक एवं वर्तमान परस्थितियों पर चर्च का केंद्र होता था खचाखच भरा वाचनालय अवं पूर्ण शांत माहोल लगता था किसी ध्यान केंद्र में बैठे हों।
व्यवस्थापक बदल गए पीढियां बदल गईं लेकिन आज भी ये पुस्तकालय अपनी पुरानी दिनचर्या पर चल रहा हैं। नई सोच के व्यवस्थापकों ने इ-लाइब्रेरी की भी व्यवस्था बना दी है।
इतिहास के पृष्ठ पलटने एवं जनक्रांति की गहराई में जाने पर पता चलता है की शास्त्र के अभ्युथान की आकांक्षा पुस्तकालयों से ही पूरी होती है। इसके लिए हम सरकार पर निर्भर नहीं रह सकते ये उत्तरदायित्व सभी बुद्धिजीवियों का हे जिसे उन्हें पूरा करना ही होगा। इस उत्तरदायित्व का निर्वहन श्री सार्वजनिक पुस्तकालय बड़े सम्मान के साथ कर रहा है। यह गाडरवारा का ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण प्रदेश का एक गौरव स्मारक है जो पिछले 100 वर्षों से अनवरत ज्ञान के अविरल स्त्रोत के रूप में देश सेवा में तत्पर है।
सुशील शर्मा (वरिष्ठ अध्यापक)
शासकीय आदर्श उच्चतर माध्यमिक विद्यालय गाडरवारा
स्वतंत्रता दिवस पर -गण से दूर होता तंत्र
स्वतंत्रता के 68 साल बाद गण से तंत्र की दूरी दर्शाती है की चूक हो रही है कंही। ....... गण के लिए तंत्र या तंत्र से त्रस्त गण ………… स्वतंत्रता का मतलब सब के लिए अलग अलग है। … लेकिन भारत के 70 % गण के लिए स्वतंत्रता का मतलब है। ………दो जून की रोटी। …… सर पर छत। .... तन के लिए लंगोटी। वैश्वीकरण के इस दौर में मोबाइल सस्ता होता जा रहा है और रोटी लगातार उछाल मार रही है। आंकड़ों के खेल में तंत्र भले ही साबित कर दे की भारत विकास के रस्ते पर सरपट दौड़ रहा है लेकिन गण आज भी विकास के दूसरे छोरे पर ही खड़ा है। ………। वह छोर जंहा से जीवन की मूलभूत सुविधाओं की शुरूआत होती है। देश की एक तिहाई आबादी रोटी और मकान के लिए झूझ रही है। ……ग्रामीण अंचल के अधिकांश बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। स्वास्थ शिक्षा जिसे सबसे सस्ता होना चाहिए आज सबसे महंगे हैं। …… गण की हैसियत से बहुत दूर गण कुपित हैं तंत्र के आगे असहाय। संविधान ने गण को अभिव्यक्ति की आजादी दी हैं। …………लेकिन वो किस बात की अभिव्यक्ति करे?........... किस से करे अपने गुस्से का इजहार? ........ तंत्र के खिलाफ सिर्फ चुनाव के समय बोल सकता हैं। ... वोट देने के बाद बोलना गुनाह हैं। एक सन्नाटा से पसरा था उसकी सियासत में वह लोग जो सच बोलते थे खड़े थे हिरासत में। एक तंत्र ने लगातार ६० वर्षो तक गण को बहलाया फुसलाया। .. हंकाया छकाया। …… दूसरा भी कोशिश में हे की वह भी गण को बहलाए हांके । सभी तंत्र देश के विकास का दावा कर रहे हैं फिर भी गण घिसट रहा है। ............. गण ताक रहा तंत्र की ओर। ......... तंत्र के 2 G कोयलाजी व्यापमजी सभी मुंह चिड़ा रहे हैं गण को............. जब आतंकियों पर होती है सियासत। …… जब निर्भयाओं को निर्भय होकर लूटा जाता है। ....... जब गण का पैसा तंत्रिओं की तिजोरी में समां जाता है। …………… जब बुद्धि जाति आधार पर नापी जाती है। ……………… जब सत्ता आरक्षण की पतवार का सहारा लेती है। ……………जंहा कूटनीतियां सत्ता के गलियारों से शुरू हो कर गरीब की रोटी पर ख़त्म होती हों। ................ जंहा योग्यता भ्रष्टाचार के क़दमों में दम तोड़ती हो ………… उस देश का गण.. तंत्र में कैसे समाहित होगा। 68 वर्षों में ताँता गण को छोड़ कर विकास के सपने देख रहा है। 1945 में जापान व जर्मनी नेस्तनाबूत हो गए थे। आज विकसित राष्ट्र हैं। 1947 के स्वतंत्र हम आज भी उनसे बहुत दूर विकास की बाह जोट रहे हैं। ……………हमारा तंत्र चल रहा है यंत्रवत परंपरागत सत्ताओं,कूटनीतियो,विदेशनीतियों की पतवार के सहारे। ……………गण को किनारे कर विकास के पथ पर हमारा देश आगे बढ़ रह है। इस देश के गण से भी कई सवाल हैं। ............. 100 रूपये में अपना मत बेचने वाले गण क्या तंत्र से सवाल पूछ सकते हैं? …………… पडोसी के घर चोरी होती देख छुप कर सोने वाला गण क्या स्वतंत्रता पाने का अधिकारी है? ……………… भ्रूण में बेटी की हत्या करनेवाला गण किस मुंह से तंत्र से सवाल पूछेगा। ............. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिमायती गण वाला आतंकियों की फांसी पर सवाल खड़े करेगा तो उसे ये भी भुगतना होगा। ………।प्रश्न बहुत है उत्तर देने वाला कोई नहीं। ................... सुलगते सवालों के बीच यह स्वतंत्र गणतंत्र। ……………गण से अलग खड़ा तंत्र। .......... और तंत्र से त्रासित गण एक दुसरे के पूरक होकर भी अपूर्ण हैं। एक प्रार्थना जो कविवर रविंद्रनाथ टैगोर ने की थी हम सभी को करनी चाहिए। जंहा मष्तिस्क भय से मुक्त हो। जंहा हम गर्व से माथा ऊँचा कर चल सकें। जंहा ज्ञान बंधनो से मुक्त हो। जंहा हर वाक्य हृदय की गहराइयों से निकलता हो। जंहा विचारों की सरिता तुच्छ आचारों की मरुभूमि में न खोती हो.। जंहा पुरूषार्थ टुकडों में न बटा हो । जंहा सभी कर्म भावनाएं अवं अनुभूतियाँ हमारे वश में हों। हे परम पिता !उस स्वातंत्र्य स्वर्ग में इस सोते हुए भारत को जाग्रत करो । ..................................... सुशील शर्मा (वरिष्ठ अध्यापक ) शासकीय आदर्श उच्चतर माध्यमिक विद्यालय गाडरवारा
Subscribe to:
Posts (Atom)