Friday, August 14, 2015
स्वतंत्रता दिवस पर -गण से दूर होता तंत्र
स्वतंत्रता के 68 साल बाद गण से तंत्र की दूरी दर्शाती है की चूक हो रही है कंही। ....... गण के लिए तंत्र या तंत्र से त्रस्त गण ………… स्वतंत्रता का मतलब सब के लिए अलग अलग है। … लेकिन भारत के 70 % गण के लिए स्वतंत्रता का मतलब है। ………दो जून की रोटी। …… सर पर छत। .... तन के लिए लंगोटी। वैश्वीकरण के इस दौर में मोबाइल सस्ता होता जा रहा है और रोटी लगातार उछाल मार रही है। आंकड़ों के खेल में तंत्र भले ही साबित कर दे की भारत विकास के रस्ते पर सरपट दौड़ रहा है लेकिन गण आज भी विकास के दूसरे छोरे पर ही खड़ा है। ………। वह छोर जंहा से जीवन की मूलभूत सुविधाओं की शुरूआत होती है। देश की एक तिहाई आबादी रोटी और मकान के लिए झूझ रही है। ……ग्रामीण अंचल के अधिकांश बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। स्वास्थ शिक्षा जिसे सबसे सस्ता होना चाहिए आज सबसे महंगे हैं। …… गण की हैसियत से बहुत दूर गण कुपित हैं तंत्र के आगे असहाय। संविधान ने गण को अभिव्यक्ति की आजादी दी हैं। …………लेकिन वो किस बात की अभिव्यक्ति करे?........... किस से करे अपने गुस्से का इजहार? ........ तंत्र के खिलाफ सिर्फ चुनाव के समय बोल सकता हैं। ... वोट देने के बाद बोलना गुनाह हैं। एक सन्नाटा से पसरा था उसकी सियासत में वह लोग जो सच बोलते थे खड़े थे हिरासत में। एक तंत्र ने लगातार ६० वर्षो तक गण को बहलाया फुसलाया। .. हंकाया छकाया। …… दूसरा भी कोशिश में हे की वह भी गण को बहलाए हांके । सभी तंत्र देश के विकास का दावा कर रहे हैं फिर भी गण घिसट रहा है। ............. गण ताक रहा तंत्र की ओर। ......... तंत्र के 2 G कोयलाजी व्यापमजी सभी मुंह चिड़ा रहे हैं गण को............. जब आतंकियों पर होती है सियासत। …… जब निर्भयाओं को निर्भय होकर लूटा जाता है। ....... जब गण का पैसा तंत्रिओं की तिजोरी में समां जाता है। …………… जब बुद्धि जाति आधार पर नापी जाती है। ……………… जब सत्ता आरक्षण की पतवार का सहारा लेती है। ……………जंहा कूटनीतियां सत्ता के गलियारों से शुरू हो कर गरीब की रोटी पर ख़त्म होती हों। ................ जंहा योग्यता भ्रष्टाचार के क़दमों में दम तोड़ती हो ………… उस देश का गण.. तंत्र में कैसे समाहित होगा। 68 वर्षों में ताँता गण को छोड़ कर विकास के सपने देख रहा है। 1945 में जापान व जर्मनी नेस्तनाबूत हो गए थे। आज विकसित राष्ट्र हैं। 1947 के स्वतंत्र हम आज भी उनसे बहुत दूर विकास की बाह जोट रहे हैं। ……………हमारा तंत्र चल रहा है यंत्रवत परंपरागत सत्ताओं,कूटनीतियो,विदेशनीतियों की पतवार के सहारे। ……………गण को किनारे कर विकास के पथ पर हमारा देश आगे बढ़ रह है। इस देश के गण से भी कई सवाल हैं। ............. 100 रूपये में अपना मत बेचने वाले गण क्या तंत्र से सवाल पूछ सकते हैं? …………… पडोसी के घर चोरी होती देख छुप कर सोने वाला गण क्या स्वतंत्रता पाने का अधिकारी है? ……………… भ्रूण में बेटी की हत्या करनेवाला गण किस मुंह से तंत्र से सवाल पूछेगा। ............. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिमायती गण वाला आतंकियों की फांसी पर सवाल खड़े करेगा तो उसे ये भी भुगतना होगा। ………।प्रश्न बहुत है उत्तर देने वाला कोई नहीं। ................... सुलगते सवालों के बीच यह स्वतंत्र गणतंत्र। ……………गण से अलग खड़ा तंत्र। .......... और तंत्र से त्रासित गण एक दुसरे के पूरक होकर भी अपूर्ण हैं। एक प्रार्थना जो कविवर रविंद्रनाथ टैगोर ने की थी हम सभी को करनी चाहिए। जंहा मष्तिस्क भय से मुक्त हो। जंहा हम गर्व से माथा ऊँचा कर चल सकें। जंहा ज्ञान बंधनो से मुक्त हो। जंहा हर वाक्य हृदय की गहराइयों से निकलता हो। जंहा विचारों की सरिता तुच्छ आचारों की मरुभूमि में न खोती हो.। जंहा पुरूषार्थ टुकडों में न बटा हो । जंहा सभी कर्म भावनाएं अवं अनुभूतियाँ हमारे वश में हों। हे परम पिता !उस स्वातंत्र्य स्वर्ग में इस सोते हुए भारत को जाग्रत करो । ..................................... सुशील शर्मा (वरिष्ठ अध्यापक ) शासकीय आदर्श उच्चतर माध्यमिक विद्यालय गाडरवारा
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment