Thursday, September 16, 2010

आनंद की इस मदहोसी में हम पल प्रतिपल बिखलाये

बोराए, शर्मयाए, घबराये, धीरे-धीरे बाहर आये|

देखा अन्तेर्मन से, न इन्द्री से न तन से,

उच्च कोटि की तन्द्रा, ये है कैसी तन-मन-धन से|



भाग-भाग कर पूर्ण किया, अपूर्ण को सम्पूर्ण किया,

आर-पार के चक्कर में जीवन मूल्यों को जीर्णे किया

उत्थिष्ट तरन्गे जीवन की आशाओ के तन से

उच्च कोटि की तन्द्रा, ये है कैसी तन-मन-धन से|



शुभ्र चांदनी में शशि, बलिहार पवन को दिखलाये

भोर हुए सूरज शर्मयाए, धीरे-धीरे बाहर आये|

ठहरा सा जीवन पल में, बिन्दुकोंर्ण उदग़म में

परिवर्तन की ललकार लिए, यूद्ध करे मन से

उच्च कोटि की तन्द्रा, ये है कैसी तन-मन-धन से|



हर पल जीवन उदित हुआ, अस्त नहीं पर व्यस्त हुआ

सुसुप्ति से बिछोय हुआ, अंतर्मन से योग हुआ

अलंकृत स्रस्ठी की छाया, बल दे जीवन से

उच्च कोटि की तन्द्रा, ये है कैसी तन-मन-धन से|



(भोपाल, इंदौर के मध्य, ट्रेन में, श्रवण मास, शुक्लपक्छ)

शशिकांत

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