Wednesday, January 13, 2021

दिनकर चला है
(नवगीत )
डॉ सुशील शर्मा

नव राह पर
दिनकर चला है।

सुरभित प्रकृति
मधुऋतु सुमन पथ।  
दिव्य दिवाकर
चला रश्मि रथ।
दूब उमगी
उड़ता मन भगे।
पथ में काँटे
उगे थे सगे।

घन तमस में
दिनकर पला है।

चूर लड्डू
तिल महकते हैं।
माघ मन में
गुड़ गमकते हैं।
बीहू पोंगल
मकर संक्रमण।
है निज अक्ष पर
दिवि का भ्रमण।

सत्य संकल्प
लेकर चला है।



 

Tuesday, December 4, 2018

हाइकु 
सुशील शर्मा 

ठंड में पेड़ 
रात भर ठिठुरा 
ओढ़ता धूप। 

चीखती रात
तनहा तारों संग 
छिपी चांदनी।

सभ्य मानव 
पर्यावरण रक्षा 
आरी कुल्हाड़ी। 

शब्द वीरान 
खोखले से खामोश 
झरते पत्ते। 

खूनी मंजर 
सहमा सा शहर 
सत्ता जहर। 

रात में चाँद 
छत पर टहले 
बिंदी लगाए। 

Wednesday, January 27, 2016

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Monday, January 25, 2016

सुशील शर्मा की रचनाएँ

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Thursday, January 21, 2016

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