Friday, August 14, 2015
समान शिक्षा नीति
सबको शिक्षा सबको काम.… सुन ने मे बहुत सुन्दर लगता है यह नारा … आज भी समान शिक्षा नीति की बाट जोह रहा भारत आज चिंतित है .... संवेदना विहीन … नैतिकता से जरा सी दूर। .... व्यवसाय से जरा सी पास …आज की शिक्षा व्यवस्था दो राहे पर खड़ी है .... दो रास्तों के बीच अंनत फासला है.… एक रास्ता जाता है …टाउन स्कूल कर उन सभी गॉवों की ओर जंहा सरकारी टाट पट्टी वाले स्कूल हैं.... एक अनुत्तरित सा न जाने किस और … दूसरा रास्ता जाता है .... अनगिनित कान्वेंट स्कूलों से .... जो अंग्रेजी को सिखाते हुए या हिंदी को भुलाते हुए..... अनगिनित नौकरियों की जिज्ञासा जगाते हुए … अभिजात्य वर्ग के बच्चों को और आगे ले जाते हुए .... या सरकारी स्कूल के बच्चों को पीछे धकेलते हुए … एक निश्चिंतता की तरफ़… आनुपातिक आंकड़े डरावने हैं .... आज नब्बे के दशक के बाद आज सरकारी स्कूलों के कितने बच्चे आशुतोष राणा शशि कांत शर्मा बन कर वैश्विक परिदृश्य में हैं … कितने बच्चे वरदमूर्ति मिश्रा ,इक़बाल मोहम्मद आशीष श्रीवास्तव या इनके जैसे अन्य और बन कर देश सेवा कर रहे हैं.... कितने बच्चे आज राजेश गुप्ता पंडित प्रेमनारायण त्रिपाठी बन कर शिक्षकों के प्रेरणा स्त्रोत बने हैं कितने बच्चे कुशलेंद्र श्रीवास्तव अनिल गुप्ता कपिल साहू बन कर निर्भीक पत्रकारिता कर रहे हैं … सभी मेरे अजीज हैं इस लिए इनका उदाहरण दे रहा हूँ ऎसे और भी हैं लेकिन .... इनकी गिनती उँगलियों पर ही है और ये सभी जबकि हैं जब कान्वेंट स्कूलों का उदय ही हुआ था .... अलग अलग आर्थिक स्तर के विद्यालओं से अलग अलग सोच लेकर जाने वाले ये भविष्य के नागरिक क्या देश के लिए समन्वय की सोच रखेंगे …
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